मैंने अपनी जिंदगी में बहुत से रिश्तों को बनते और टूटते हुए देखा है ...
पर कभी कभी मैं ये सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ की जब दो इंसानों को रिश्ता तोडना ही था तो उन्होंने उससे जोड़ा ही क्यों की अंत में दोनों को तकलीफ हो! और ऐसे में मैंने बहुत लोगो को ये भी कहते हुए सुना है हमारे हाथ में कुछ नहीं था मजबूरी थी और पता नहीं क्या क्या कहते है लोग अपने टूटते हुए रिश्ते के टूटने ज़रिये के बारे में !
मैं सिर्फ उन् लोगो की बात कर रहा हूँ जो अपने रिश्तो को लेकर काफी संजीदा होते है !
पर मुझे लगता है ये गलत है मैंने ये नहीं कह रहा हूँ की दोनों में किसी की गलती है, पर यहाँ व्यंग इंसानी जज्बातों पे है की इंसान उन्हें कैसे अपने काबू में रख सकते है ..इंसान को एक रिश्ते में पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए अगर उससे कोई बात का बुरा लगता है तो उससे कहना चाहिए ..बातो से एक रिश्ते में हर समस्या का समाधान किया जा सकता है ...........
अगर आप रिश्ते को हमशा सहज के रखना चाहते है तो मेरी सलाह को जरुर मानिए !!
लेकिन मैं ये भी कहना चाहता हूँ की एक साचे रिश्ते में जितनी पारदर्शिता बातो में जरुरी है उतनी ही जरुरी ख़ामोशी में भी है ...
पर कभी कभी रिश्ते इतने मुस्किल हो जाते है की उन्हें ख़तम कर देना ही दोनों इंसानों के लिए अच्छा रहता है पर इस बात का ख्याल रखना चाहिए की जिंदगी के किसी मोड़ पर अगर कभी आमना सामना हो तो मुस्कुरा के हो...हसींन मोड़ पर खत्म किये गए रिश्ते शायद कही दुबारा मिल जाये ....
और जब एक रिश्ता एक गलत मोड़ पे खत्म होता है तो इंसान को देर सवेर अपनी गलती का एहसास जरुर होता है पर इंसान अपने ego को गलत नाम 'आत्म-सम्मान' देके उससे विवश होके अपनी गलती को नहीं मान पता और जब समय बीतता है वो अपनी गलती स्वीकारता है हिमत करता है तोह दूसरा इंसान भी अपने ego में रह के काफी बार उससे माफ़ नहीं करता और ये भूल जाता है की माफ़ी मांगने के लिए बहुत हिमात की जरुरत होती है और माफ़ करने के लिए बड़े दिल की !!इंसान को अपने ego और अपने आत्म-सम्मान में फर्क समझना चाहिए !
इस दुनिया में सभी तरह के लोगो होते है:
"कुछ जिंदगी जीने के लिए रिश्ते बनाते है ,और कुछ लोगो की जिंदगी रिश्ते बन जाती है !"
आज आप सभी लोगो से एक बहुत ही खास दोस्त की कही हुयी बात को बाँट रहा हूँ :
"दो इंसानों में सच्चा रिश्ता तभी बनता है जब उन् दोनों के बिच एक बहुत लम्बी ख़ामोशी भी बहुत Comfortable ho "!!!
पर कभी कभी मैं ये सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ की जब दो इंसानों को रिश्ता तोडना ही था तो उन्होंने उससे जोड़ा ही क्यों की अंत में दोनों को तकलीफ हो! और ऐसे में मैंने बहुत लोगो को ये भी कहते हुए सुना है हमारे हाथ में कुछ नहीं था मजबूरी थी और पता नहीं क्या क्या कहते है लोग अपने टूटते हुए रिश्ते के टूटने ज़रिये के बारे में !
मैं यहाँ सिर्फ कुछ इंसानी जज्बातों पे रौशनी डालना चाहता हूँ !
मैंने अपने जीवन में लोगो के नज़रिए को अपने रिश्तो को लेकर बदलते हुए देखा है ......मैं सिर्फ उन् लोगो की बात कर रहा हूँ जो अपने रिश्तो को लेकर काफी संजीदा होते है !
जब लोग एक रिश्ते में होते है और उन्हें दुसरे की कई बातो का बुरा लगता है और वो मन के किस्सी कोने में frustrate होने लगते है पर अपने रिश्ते और दुसरे का ख्याल करके वो कुछ नहीं कह पाते !और फिर सामने वाले इंसान को इस चीज़ है एहसास भी नहीं हो पता है..
फिर धीरे-धीरे वक़्त के साथ साथ वो छोटी छोटी बाते जिन बातो का सिर्फ बुरा लगता था पहले वो और ज्यदा बढ़ने लगता है और frustration बढती जाती है !! और इंसान कभी कुछ कहता है और कभी नहीं ..और फिर एक दिन frustration आपकी caring feeling को dominate कर देती है और आपको वो ही रिश्ता जो आपके लिए सब कुछ था, बहुत मायने रखता था वो बोझ सा महसूस होने लगता है ... और इंसान इसी चीज़ को हालात का नाम दे देता है ...पर मुझे लगता है ये गलत है मैंने ये नहीं कह रहा हूँ की दोनों में किसी की गलती है, पर यहाँ व्यंग इंसानी जज्बातों पे है की इंसान उन्हें कैसे अपने काबू में रख सकते है ..इंसान को एक रिश्ते में पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए अगर उससे कोई बात का बुरा लगता है तो उससे कहना चाहिए ..बातो से एक रिश्ते में हर समस्या का समाधान किया जा सकता है ...........
अगर आप रिश्ते को हमशा सहज के रखना चाहते है तो मेरी सलाह को जरुर मानिए !!
लेकिन मैं ये भी कहना चाहता हूँ की एक साचे रिश्ते में जितनी पारदर्शिता बातो में जरुरी है उतनी ही जरुरी ख़ामोशी में भी है ...
पर कभी कभी रिश्ते इतने मुस्किल हो जाते है की उन्हें ख़तम कर देना ही दोनों इंसानों के लिए अच्छा रहता है पर इस बात का ख्याल रखना चाहिए की जिंदगी के किसी मोड़ पर अगर कभी आमना सामना हो तो मुस्कुरा के हो...हसींन मोड़ पर खत्म किये गए रिश्ते शायद कही दुबारा मिल जाये ....
और जब एक रिश्ता एक गलत मोड़ पे खत्म होता है तो इंसान को देर सवेर अपनी गलती का एहसास जरुर होता है पर इंसान अपने ego को गलत नाम 'आत्म-सम्मान' देके उससे विवश होके अपनी गलती को नहीं मान पता और जब समय बीतता है वो अपनी गलती स्वीकारता है हिमत करता है तोह दूसरा इंसान भी अपने ego में रह के काफी बार उससे माफ़ नहीं करता और ये भूल जाता है की माफ़ी मांगने के लिए बहुत हिमात की जरुरत होती है और माफ़ करने के लिए बड़े दिल की !!इंसान को अपने ego और अपने आत्म-सम्मान में फर्क समझना चाहिए !
इस दुनिया में सभी तरह के लोगो होते है:
"कुछ जिंदगी जीने के लिए रिश्ते बनाते है ,और कुछ लोगो की जिंदगी रिश्ते बन जाती है !"
आज आप सभी लोगो से एक बहुत ही खास दोस्त की कही हुयी बात को बाँट रहा हूँ :
"दो इंसानों में सच्चा रिश्ता तभी बनता है जब उन् दोनों के बिच एक बहुत लम्बी ख़ामोशी भी बहुत Comfortable ho "!!!